वैर से वैर कभी शांत नहीं होता: वैश्विक युद्धों में बौद्ध धर्म का समाधान और प्रासंगिकता
आज जब हम सुबह उठकर अख़बार या न्यूज़ चैनल देखते हैं, तो हर तरफ केवल मिसाइलों, ड्रोन हमलों और युद्ध की ख़बरें छाई रहती हैं। आधुनिक कूटनीति “ईंट का जवाब पत्थर से देने” (Tit for Tat) के सिद्धांत पर काम कर रही है। लेकिन क्या हिंसा का जवाब और बड़ी हिंसा से देने पर कभी स्थायी शांति मिल सकती है?
इस ज्वलंत प्रश्न का सबसे सटीक और वैज्ञानिक उत्तर आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने दिया था। आज के इस दौर में जब विश्व तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर खड़ा प्रतीत होता है, तब बौद्ध धर्म का ‘समाधान मूलक दर्शन’ सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
धम्मपद का शाश्वत संदेश: ‘अवैर’ का सिद्धांत
बौद्ध साहित्य के सबसे पवित्र और लोकप्रिय ग्रंथ ‘धम्मपद’ (यमक वग्ग) की 5वीं गाथा में मनुष्य की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या का समाधान छिपा है। भगवान बुद्ध कहते हैं:
“न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥”
हिंदी अर्थ: “इस संसार में कभी भी वैर (दुश्मनी/द्वेष) से वैर समाप्त नहीं होता, वैर तो केवल अवैर (प्रेम, क्षमा, करुणा और बातचीत) से ही शांत होता है। यही सनातन (सदैव से चला आ रहा) धर्म है।”
यह केवल एक आध्यात्मिक श्लोक नहीं है, बल्कि ‘संघर्ष समाधान’ (Conflict Resolution) का एक अटल मनोवैज्ञानिक नियम है। आग को कभी आग से नहीं बुझाया जा सकता, उसके लिए पानी की ही आवश्यकता होती है। ठीक उसी तरह, नफरत और प्रतिशोध से केवल एक दुष्चक्र (Vicious Cycle) पैदा होता है, जिसका कोई अंत नहीं है।
समसामयिक संदर्भ: ईरान, इस्राइल और अमेरिका का तनाव
बुद्ध के इस ‘अवैर’ सिद्धांत को वर्तमान मध्य-पूर्व (Middle East) के संकट से आसानी से समझा जा सकता है। आज इस्राइल, ईरान और अमेरिका के बीच जो त्रिकोणीय और हिंसक संघर्ष चल रहा है, वह ‘वैर से वैर’ को शांत करने की असफल कोशिश का सबसे बड़ा उदाहरण है।
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प्रतिशोध का अंतहीन चक्र: एक पक्ष हमला करता है, तो दूसरा पक्ष अपनी संप्रभुता और शक्ति दिखाने के लिए उससे भी बड़ा ‘जवाबी हमला’ (Retaliation) करता है। ईरान द्वारा इस्राइल पर मिसाइल दागना, फिर इस्राइल द्वारा पलटवार करना और इसमें अमेरिका का सैन्य और रणनीतिक हस्तक्षेप— यह सब प्रतिशोध के उस चक्र को जन्म दे रहा है जिसमें आम नागरिक, बच्चे और मानवता पिस रही है।
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हथियारों से नहीं, संवाद से समाधान: इतिहास गवाह है कि किसी भी युद्ध का अंतिम निर्णय युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि ‘बातचीत की मेज’ (Negotiation Table) पर ही होता है। आज के इन शक्तिशाली देशों को यह समझना होगा कि हथियारों की होड़ और ‘डिटरेंस’ (Deterrence) के नाम पर फैलाया जा रहा डर कभी स्थायी शांति नहीं ला सकता।
वैश्विक युद्ध में बौद्ध धर्म का समाधान मूलक योगदान
यदि आज वैश्विक कूटनीति में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को लागू किया जाए, तो विश्व को विनाश से बचाया जा सकता है:
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मज्झिमा पटिपदा (मध्यम मार्ग): अतिवादी (Extremist) नीतियों को छोड़कर बीच का रास्ता अपनाना, जहाँ दोनों पक्षों की चिंताओं को सुनकर कूटनीतिक समाधान निकाला जाए।
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करुणा और मुदिता: शत्रु देश के नागरिकों के प्रति भी मानवीय संवेदना रखना। युद्ध केवल सरकारों के बीच होते हैं, लेकिन पीड़ा इंसान भोगता है।
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प्रतीत्यसमुत्पाद (Cause and Effect): यह समझना कि हर हमले का एक परिणाम होगा जो भविष्य में एक नए युद्ध का कारण बनेगा। इस ‘कारण-कार्य’ की श्रृंखला को केवल ‘अवैर’ (क्षमा और संवाद) से ही तोड़ा जा सकता है।
निष्कर्ष
आज की वैश्विक शक्तियों को यह अहंकार छोड़ना होगा कि वे हथियारों के बल पर दुनिया को झुका सकते हैं। जब तक ‘वैर’ (प्रतिशोध) को कूटनीति का आधार माना जाएगा, तब तक शांति केवल एक भ्रम रहेगी। ईरान, इस्राइल और अमेरिका जैसे देशों के लिए आज सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत युद्ध जीतना नहीं, बल्कि बुद्ध के ‘अवैर’ के मार्ग पर चलकर इस हिंसक चक्र को तोड़ना है। क्योंकि अंततः, “यही सनातन धर्म है।”
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